बुधवार, 5 अगस्त 2020

Bhai duj 2020

Bhai Dooj 2020


Bhai Dooj, a Hindu festival is celebrated on the second lunar day of Shukla Paksha in the Vikram Samvat Hindu calendar. Also known as ‘Bhai Phonta’, ‘Bhai Tika’, ‘Bhau Beej’, and ‘Yamadvitiya’, the festival is celebrated in the country during Diwali with a lot of enthusiasm and spirit. In 2020, the festival is scheduled to be celebrated on 16th November.

Bhai Dooj 2020


Bhai Dooj or Bhaiya Dooj is a Hindu festival that is celebrated by all women by praying for the long life of their brothers and in return receive gifts. The festival is celebrated on the very last day of the 5 days long Diwali festival which is the second day of the bright fortnight or Shukla Paksha in the Hindu month of Kartik.

Legend has it that as per the Hindu mythology, after defeating the evil demon Narakasura, Lord Krishna paid a visit to his sister Subhadra who gave him a warm welcome with sweets and flowers. She applied tilaka on Krishna's forehead with affection. It is believed by some that this is the origin of the festival. However, Legend has it that on this particular day, Yama, the God of Death visited his sister, Yami. She put tilak on her brother Yama's forehead, garlanded him and fed him special dishes that she cooked herself. Since they were meeting each other after a long time, they dined together and talked to each other to their heart's content. They also exchanged gifts to each other and Yami had made the gift with her own hands. Yama then announced that whoever receives tilak from his sister on this particular day will enjoy long life and prosperity. Based on this, Bhai Dooj is also known as Yama Dwitiya.

Bhai Dooj is celebrated by the invitations of the brothers by the sisters for specially made scrumptious meals that include their most relished dishes. The ceremony is about the brother's responsibility to protect his sister along with the blessings of the sister. It is a very traditionally celebrated ceremony where the sisters ensure to perform aarti of their brothers and apply red tika on their forehead. The tika ceremony on the occasion of Bhai Dooj signifies the prayers of a sister for the long life and prosperous accumulation of her brother. In return, the brother gives gifts which may also be in form of monetary terms. In certain parts of India, women who do not have a brother worship, Lord Moon, instead. As a tradition, they apply Mehendi (henna) on their hands as a tradition. At different places, Bhai Dooj festival is celebrated in different ways. In Haryana, Bhai Phota is celebrated with high energy and fervour. There are numerous rituals conducted during the ceremony that also includes that grand feast for the brothers. On this particular day, the brothers visit their sister's home and the ceremony begins with an Aarti. A tradition is followed on Bhai Dooj where the coconuts are also worshipped and presented to the brother by the sister. The sister then goes on to apply tilak on her brother's forehead and feed him handmade tasty savouries. She also gives her brother blessings for a long and content life. As mentioned earlier, this is followed by the exchange of gifts between the brothers and sisters. This festival is quite similar to the festival of Raksha Bandhan. The festival of Bhai Dooj also gives a chance to family members and relatives to meet each other and spend some great time together till their heart is content.

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बुधवार, 15 जुलाई 2020

नाग पंचमी कब है 2020

नाग पंचमी कब है?


2020: नाग पंचमी का पर्व 25 जुलाई को शनिवार के दिन मनाया जाएगा। हर साल नाग पंचमी का त्योहार सावन माह के शुक्ल की पंचमी तिथि को मनाया जाता है।


नाग पंचमी पर इस तरह करें।

ऐसे करें पूजा


-सबसे पहले प्रात: उठकर घर की साफ-सफाई करें और स्‍नान करें।

-इसके बाद प्रसाद स्‍वरूप सिंवई की खीर और चावल बना लें।

-लकड़ी के पटरे पर साफ लाल या पीला कपड़ा बिछाकर उस पर नागदेवता की प्रतिमा या फिर तस्‍वीर रख दें।

-प्रतिमा पर जल, फूल, फल और चंदन लगाएं।

-नाग की प्रतिमा को दूध, दही, घी, मधु और पंचामृत से स्‍नान कराएं और फिर आरती करें।

-पूजा के बाद आप घर के मुख्‍य द्वार के दोनों ओर गोबर से सांप की आकृति के चिह्न बनाएं और उस पर कौड़ियां चिपकाएं और खीर अर्पित करें। ऐसा करने से आपके घर की बुरी शक्तियों से रक्षा होती है और मां लक्ष्‍मी का आगमन होता है।


नाग पंचमी से 5 लाभ होते हैं।



हिंदू धर्म में सांप को दैवीय जीव के रूप में पूजा जाता है। प्राचीनकाल से ही नागपंचमी के दिन सांपों की पूजा की जाती रही है। नागपंचमी का पर्व मनाने के पीछे कई रोचक पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। जानते हैं इस त्‍योहार के बारे में अन्‍य खास बातें…


1.हिंदुओं के अराध्‍य देवताओं का सांपों के प्रति विशेष लगाव प्राचीन काल से ही है। शेषनाग पर लेटे भगवान विष्‍णु हों या फिर कंठ में सर्परूपी माला धारण करने वाले भगवान शिव। यहां तक कि माता पार्वती के कई मंदिरों में भी नागों की विशेष पूजा होती है। लोग मां दुर्गा के प्रारंभिक स्‍वरूप के रूप में भी नागों की पूजा करते हैं।

2. सावन मास के शुक्‍ल पक्ष की पंचमी तिथि को नागपंचमी मनाई जाती है। इस बार यह 15 अगस्‍त को है। वहीं देश के कई भागों में सावन के कृष्‍ण पक्ष की पंचमी को भी नागपंचमी के रूप में मनाया जाता है।

3.हिंदू पुराणों में नागों को पाताल लोक या फिर नाग लोक का स्‍वामी माना जाता है। नागपंचमी के दिन सर्पों की देवी मनसा देवी की विशेष पूजा की जाती है। दक्षिण भारत में हिमालय श्रृंखला के शिवालिक पर्वत पर मनसा देवी का विशाल मंदिर स्थित है। मान्‍यता है कि भगवान शिव के अंश से ही मनसा देवी की उत्‍पत्ति हुई थी। इन्‍हें नाग समुदाय की देवी और नागराज वासुकी की बहन भी माना जाता है। मान्‍यता है कि नागपंचमी के दिन मनसा देवी की आराधना करने से भक्‍तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और नाग दंश का भय दूर होता है।

4. नागपंचमी के दिन सांपों को दूध और लावा अर्पित करके भक्‍तजन अपने परिवार के सुख, समृद्धि और सुरक्षा का वरदान मांगते हैं। भारत के अलावा यह त्‍योहार पड़ोसी देश नेपाल में भी धूमधाम से मनाया जाता है। कुछ स्‍थानों पर चतुर्थी के दिन भी सांपों की पूजा होती है। इसे नाग चतुर्थी कहा जाता है।


5. पुराणों में बताया गया है कि एक बार कालिया नाग ने पूरी यमुना नदी के पानी में अपने शरीर से विष घोल दिया था। बृजवासियों के लिए नदी का पानी जहर बन चुका था। फिर भगवान विष्‍णु के अवतार भगवान कृष्‍ण ने बृजवासियों की समस्‍या के निवारण के लिए एक चाल चली। ए‍क दिन वह गेंद ढूंढने के बहाने से यमुना में कूद गए और वहां डेरा डाले कालिया नाग को युद्ध में पछाड़ दिया।

युद्ध में पराजित होने के बाद कालिया नाग ने नदी में घुले अपने संपूर्ण विष को वापस ले लिया। उस दिन सावन की पंचमी तिथि थी। इसके बदले में भगवान कृष्‍ण ने उन्‍हें वरदान दिया कि जो भी पंचमी के दिन सर्प देवता को दूध पिलाएगा उसके जीवन से सारे कष्‍ट दूर हो जाएंगे। उसी दिन से नागपंचमी का त्‍योहार मनाया जाता है।

6. नागपंचमी मनाने के पीछे समुद्र मंथन से जुड़ी एक और कथा प्रचलित है। मान्‍यता है कि समुद्र मंथन से निकले हलाहल विष की कुछ बूंदों को सांपों ने पी लिया। इसके बाद से सांप जहरीले हो गए। इसलिए अपने परिवार को नागदंश से बचाने के लिए नागपंचमी के दिन भक्‍त सर्प देवता की पूजा करते हैं। भविष्य पुराण में और महाभारत में नागपंचमी की पूजा का संबंध पाण्डव वंशीय राजा जनमेजय के नाग यज्ञ से बताया गया है।

लाभ 


इस दिन व्रत पूजन से नाग देवता का आशीर्वाद प्राप्त होता है। नागदेवता का आशीष वंश वृद्धि के साथ, सुख, सौभाग्य,समृद्धि,सफलता,संपन्नता और स्नेहमयी जीवन के लिए शुभ और फलदायक होता है।

इस दिन पूजन से पितरों को तृप्ति और शांति मिलती है। पितृ प्रसन्न होकर आशीर्वाद प्रदान करते हैं।

संत रामपाल जी महाराज
नाग देवता की पूजा करने से परमात्मा प्राप्ति नहीं होती है । न ही मोक्ष की प्राप्ति होती है।
यह साधना शास्त्रों के विरुद्ध है।
आज पूरे विश्व में सही शस्त्र अनुकूल भगतिविधी जगतगुरु रामपाल जी महाराज के पास है। जो हमारे शास्त्र में प्रमाणित हैं। अर्थात् वेद ,गीता इत्यादि।
नाग पंचमी पर स्पेस्ल वीडियो
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https://youtu.be/BtejbftdKo8

अधिक जानकारी के लिए देखें साधना टीवी 7:30शाम ।
और पडे पुस्तक ज्ञान गंगा , जीने की राह

अपना सुझाव अवश्य दे।

बुधवार, 8 जुलाई 2020

सही शिक्षा क्या है?

शिक्षा का अर्थ



Shiksha ka mahatva
सही शिक्षा का महत्व

लैटिन भाषा के ‘एडूकेटम’ शब्द का अर्थ है शिक्षित करना। ‘ए’ का अर्थ है अन्दर से तथा ‘डूको’ का अर्थ है आगे बढ़ना अथवा विकास अर्थात अन्दर से विकास। अब प्रश्न यह उठता है कि अन्दर से विकास का अर्थ क्या है ? इस प्रश्न का सरल उत्तर यह है कि प्रत्येक बालक के अन्दर जन्म से ही कुछ जन्मजात प्रवृतियां होती है। जैसे-जैसे बालक वातावरण के संपर्क में आता जाता है, वैसे-वैसे उसकी जन्मजात शक्तियों को अन्दर से बाहर की और विकसित करना, अन्दर को ठूंसना नहीं। एडुकेटम का अतिरिक्त उक्त दोनों शब्दों - एडूसीयर तथा एडूकेयर का अर्थ भी यही है। एडूसीयर का अर्थ है – निकालना तथा एडूकेयर का अर्थ है- आगे बढ़ना, बाहर निकालना अथवा विकसित करना। इस प्रकार शिक्षा शब्द का अर्थ है जन्मजात शक्तियों का सर्वांगीण विकास है।

सच्ची शिक्षा की परिभाषा

https://youtu.be/w1d7quUBIT8
सच्ची शिक्षा की परिभाषा

शिक्षा के विभिन्न अर्थों, अधरों तथा परिभाषा पर प्रकाश डालने से यह स्पष्ट हो जाता है कि शिक्षा एक सापेक्ष, चेतन अथवा अचेतन, मनोवैज्ञानिक, सामाजिक, वैज्ञानिक, एवं दार्शनिक वातावरण सम्बन्धी प्रक्रिया है जिसके द्वारा व्यक्ति के व्यक्तित्व सम्बन्धी सभी अंगों का विकास इस प्रकार से होना चाहिये कि वह परिवर्तन विरोधी तथा रचनात्मक साधनों के द्वारा सच्चा सुख और आनन्द प्राप्त कर सके। संक्षेप में, शिक्षा वातावरण सम्बन्धी सविचार प्रक्रिया है जिसके द्वारा मानव का विकास तथा समाज का कल्याण होना चाहिये। Remont ने भी शिक्षा को विकास की सचेतन तथा आजीवन चलने वाली प्रक्रिया माना है जिसके द्वारा मनुष्य अध्यात्मिक, भौतिक तथा सामाजिक आदि सभी प्रकार के विभिन्न वातावरणों से समायोजन प्राप्त करना सीख जाये। अत: शिक्षा को परिभाषित करते हुए remont ने ठीक ही लिखा है – शिक्षा उस विकास का नाम हिया जो शैशव अवस्था से प्रौढ़ अवस्था तक होता ही रहता है अर्थात शिक्षा वह क्रम है, जिससे  मानव अपने को आवश्यकतानुसार भौतिक, सामाजिक तथा आध्यात्मिक वातावरण के अनुकूल बना लेता है।

शिक्षा क्या है?

https://youtu.be/QGiKiPneyHo
शिक्षा क्या है?

   शिक्षा शब्द संस्कृत के शिक्ष् धातु से बना है जिसका अर्थ है सीखना या सिखाना। यानि इस अर्थ में शिक्षा सीखने-सिखाने की प्रक्रिया है। शिक्षा के लिए विद्या शब्द का भी उपयोग किया जाता है जिसका अर्थ होता है जानना। एजुकेशन शब्द लैटिन भाषा के चार शब्दों से मिलकर बना है जिसका अर्थ है प्रशिक्षित करना, अन्दर से बाहर निकालना, पालन पोषण करना और आंतरिक से वाह्य की तरफ जाना।
अतः संक्षेप में कहा जा सकता है कि शिक्षा का अर्थ मनुष्य की आंतरिक शक्तियों को बाहर की तरफ आने के लिए प्रेरित करना। जॉन एडम्स के मुताबिक प्राचीन काल में शिक्षा शिक्षक केंद्रित थी। जिसके दो छोर थे, शिक्षक और शिक्षार्थी। बाद में जॉन डिवी ने शिक्षा को बालकेंद्रित बताते हुए इसके तीन केंद्रों का जिक्र किया। जो क्रमशः शिक्षक, शिक्षार्थी और पाठ्यक्रम हैं।
शिक्षा की विभिन्न परिभाषाएं
गीता से अनुसार, “सा विद्या विमुक्ते”। यानि विद्या वही है जो बंधनों से मुक्त करे।

इस शिक्षा से क्या लाभ लें


इस शिक्षा का हमें लाभ लेना चाहिए कि हम अपने सद ग्रंथों को समझें। की उम्र में परमात्मा मिलने की विधि बताई गई है। वह विधि अपनाकर हम पूर्ण मोक्ष प्राप्त कर सकते हैं। इस शिक्षा का सही उपयोग तो यह है की हमारा परमात्मा कौन है कहां रहता है वह कैसा है यह जानना हमारे लिए बहुत ही अनिवार्य है। आज इस पूरे विश्व में एक ही ऐसे संत हैं जो सद ग्रंथों से प्रमाणित की विधि बता रहे हैं। संत रामपाल जी महाराज है। जिन्होंने यह सभी ग्रंथों से प्रमाणित किया है कि हमारा परमात्मा पूर्ण ब्रह्म एक है उसका नाम कबीर है।
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शिक्षा के बारे में आपकी कोई राय हो तो कमेंट बॉक्स में अवश्य बताएं।

मंगलवार, 16 जून 2020

krishna janmashtami । कृष्ण जन्माष्टमी


श्री कृष्ण जी का जन्म मथुरा में हुआ था। श्री कृष्ण को मथुरा के लोग अपना आराध्य देव मानते हैं। श्री कृष्ण जी छोटे होते हुए भी नटखट थे, मखन चोर थे। 
श्री कृष्ण जी गो को वन में चराते थे और उनके साथ ग्वाले भी होते थे। गोपिया उनकी बांसुरी की धुन सुनकर मोहित हो जाती थी। 



श्री कृष्ण जी बहुत ही अच्छे देव माने जाते हैं परंतु फिर भी उनकी शक्ति सीमित है।
गीता जी के अंदर श्री कृष्ण जी अर्जुन को कह रहे हैं कि जो जैसा कर्म करेगा उसको वैसा ही फल मिलेगा।
कहने का मतलब है जिस मनुष्य के पाप है तो पाप ,पुण्य है तो पुण्य, इनको कम ज्यादा नहीं कर सकते।
गीता जी में प्रमाणित किया है कि वह परम अक्षर ब्रह्म जो सबका पिता है उस एक की भक्ति करो।
उसका नाम भी गीता जी में बताया है उसका नाम कबीर देव है।

श्री कृष्ण जी v/s परमात्मा कबीर साहिब।


श्री कृष्ण जी ने अर्जुन के अभिमान को शांत करने के लिए। इंद्र देव के पुत्र मोरध्वज को आरे से चिरवा दिया था। फिर उसको श्री कृष्ण जी ने अपनी शक्ति से जीवित कर दिया था।
जब श्री कृष्ण जी के सगे भांजे की मृत्यु होने पर उसे नहीं जीवित कर पाए। उस समय सारा पांडव रो रहा था। क्योंकि वह मनुष्य की उम्र को नहीं बढ़ा सकते



कबीर परमात्मा जी ने सेखतकी
नाम के मुसलमान फकीर के कहने पर।
दरिया में एक शव बहता जा रहा था उस शव को परमात्मा कबीर साहिब जी ने अपनी शक्ति से जीवित कर दिया था।




परमात्मा कबीर साहिब जी की दूसरी परीक्षा
शेखतकि कि अपनी बेटी को जीवित करने के लिए कबीर साहिब जी को कहा।
कबीर, कबीर साहिब जी ने उस शेख तकी की बेटी को जीवित कर दिया था।



शनिवार, 13 जून 2020

कबीर साहेब

कबीर साहिब जी की अमृतवाणी

कबीर, तीन लोक पिंजरा भया, पाप पुण्य दो जाल। सभी जीव भोजन भये, एक खाने वाला काल।।
गरीब, एक पापी एक पुन्यी आया, एक है सूम दलेल रे।
बिना भजन कोई काम नहीं आवै, सब है जम की जेल रे।।

कबीर साहेब प्रकट



कबीर साहिब जी सन 1398 ईसवी में प्रकट हुआ थे।
सन् 1398 में कबीर साहिब जी काशी के लहरतारा तलाब मैं एक कमल के फूल पर नीरू नीमा को मिले थे।



नीरू ने कबीर साहिब जी को घर ले जाने से मना कर दिया था। परंतु पूर्ण परमात्मा ने उन्हें कहा कि मुझे घर पर ले चलो आपको लोग कुछ भी नहीं कहेंगे।

तब नीरू ने परमात्मा कबीर साहेब जी को अपने कुटिया में लगे थे।



कबीर साहिब जी ने 25 दिन तक दूध नहीं पिया था।
नीमा शिव जी का ध्यान देती थी वह शिव जी को पुकार करती है तो शिवजी एक ऋषि के रूप में नीरू के घर आए। उस ऋषि ने कबीर साहिब जी को अपनी गोद में लिया और उनसे 7 बार वार्ता की। तब कबीर जी ने उस ऋषि को कहा था कि इन्हें कहिए कि वह एक कुंवारी गाय लेकर आए उसका दूध पियूंगा।
कुंवारी गाय लाने के बाद कबीर जी के कहने के उपरांत ऋषि जी ने गाय के पीठ पर हाथ रखा और दूध निकलने लगा।
तब परमात्मा जी ने उस कुमारी गाय का दूध पिया था।


कौन तथा कैसा है कुल का मालिक?



जिन-जिन पुण्यात्माओं ने परमात्मा को प्राप्त किया उन्होंने बताया कि कुल का
मालिक एक है। वह मानव सदृश तेजोमय शरीर युक्त है। जिसके एक रोम कूप
का प्रकाश करोड़ सूर्य तथा करोड़ चन्द्रमाओं की रोशनी से भी अधिक है। उसी
ने नाना रूप बनाए हैं। परमेश्वर का वास्तविक नाम अपनी-अपनी भाषाओं में
कविर्देव (वेदों में संस्कृत भाषा में) तथा हक्का कबीर (श्री गुरु ग्रन्थ साहेब में पृष्ठ
नं. 721 पर क्षेत्राय भाषा में) तथा सत् कबीर (श्री धर्मदास जी की वाणी में क्षेत्राय
भाषा में) तथा बन्दी छोड़ कबीर (सन्त गरीबदास जी के सद्ग्रन्थ में क्षेत्राय भाषा
में) कबीरा, कबीरन् व खबीरा या खबीरन् (श्री कुरान शरीफ़ सूरत फुर्कानि नं. 25,
आयत नं. 19, 21, 52, 58, 59 में क्षेत्राय अरबी भाषा में)। इसी पूर्ण परमात्मा के
उपमात्मक नाम अनामी पुरुष, अगम पुरुष, अलख पुरुष, सतपुरुष, अकाल मूर्ति,
शब्द स्वरूपी राम, पूर्ण ब्रह्म, परम अक्षर ब्रह्म आदि हैं, जैसे देश के प्रधानमंत्रा का
वास्तविक शरीर का नाम कुछ और होता है तथा उपमात्मक नाम प्रधान मंत्रा जी,
प्राइम मिनिस्टर जी अलग होता है। जैसे भारत देश का प्रधानमंत्रा जी अपने पास
गृह विभाग रख लेता है। जब वह उस विभाग के दस्त्तावेजों पर हस्त्ताक्षर करता
है तो वहाँ गृहमंत्रा की भूमिका करता है तथा अपना पद भी गृहमन्त्रा लिखता है,

हस्त्ताक्षर वही होते हैं। इसी प्रकार ईश्वरीय सत्ता को समझना है।





‘‘अवतार की परिभाषा’’


अवतार’ का अर्थ है ऊँचे स्थान से नीचे स्थान पर उतरना। विशेषकर यह
शुभ शब्द उन उत्तम आत्माओं के लिए प्रयोग किया जाता है, जो धरती पर कुछ
अद्धभुत कार्य करते हैं। जिनको परमात्मा की ओर से भेजा हुआ मानते हैं या स्वयं
परमात्मा ही का पृथ्वी पर आगमन मानते हैं।
श्री मद्भगवत गीता अध्याय 15 श्लोक 1 से 4 तथा 16.17 में तीन पुरूषों
(प्रभुओं) का ज्ञान है।
ु 1ण् क्षर पुरूष जिसे ब्रह्म भी कहते हैं। जिसका ¬ नाम साधना का है। जिसका
प्रमाण गीता अध्याय 8 श्लोक 13 में है।
ु 2ण् अक्षर पुरूष जिसको परब्रह्म भी कहते हैं। जिसकी साधना का मंत्रा तत्
जो सांकेतिक है। प्रमाण गीता अध्याय 17 श्लोक 23 में है।
ु 3ण् उत्तम पुरूष तूः अन्यः = श्रेष्ठ पुरूष परमात्मा तो उपरोक्त दोनों पुरूषों
(क्षर पुरूष तथा अक्षर पुरूष) से अन्य है। वह परम अक्षर पुरूष है जिसे गीता
अध्याय 8 श्लोक 1 के उत्तर में अध्याय 8 के श्लोक 3 में कहा है कि वह परम अक्षर
ब्रह्म है। इसका जाप सत् है जो सांकेतिक है। इसी परमेश्वर की प्राप्ति से साधक
को परम शांति तथा सनातन परमधाम प्राप्त होगा। प्रमाण गीता अध्याय 18 श्लोक
62 में यह परमेश्वर (परम अक्षर ब्रह्म) गीता ज्ञान दाता से भिन्न है। अधिक ज्ञान
प्राप्ति के लिए कृप्या पुस्तक ‘‘धरती पर अवतार’’ सतलोक आश्रम बरवाला से
प्राप्त करें। अवतार दो प्रकार के होते हैं। जैसे ऊपर कहा गया है। अब आप जी
को पता चला कि मुख्य रूप से तीन पुरूष (प्रभु) है। जिनका उल्लेख ऊपर कर
दिया गया है। हमारे लिए मुख्य रूप से दो प्रभुओं की भूमिका रहती है।
1ण् क्षर पुरूष (ब्रह्म) :- जो गीता अध्याय 11 श्लोक 32 में अपने आप को काल
कहता है।
2ण् परम अक्षर पुरूष (परम अक्षर ब्रह्म) :- जिसके विषय में गीता अध्याय 8
श्लोक 3 तथा 8ए9ए10 में तथा गीता अध्याय 18 श्लोक 62 अध्याय 15 श्लोक 1

से 4 तथा 17 में कहा है।







ब्रह्म (काल) के अवतारों की जानकारी



गीता अध्याय 4 का श्लोक 7
यदा, यदा, हि, धर्मस्य, ग्लानिः, भवति, भारत,
अभ्युत्थानम्, अधर्मस्य, तदा, आत्मानम्, सृजामि, अहम्।।7।।
अनुवाद : (भारत) हे भारत! (यदा,यदा) जब-जब (धर्मस्य) धर्मकी (ग्लानिः)
हानि और (अधर्मस्य) अधर्मकी (अभ्युत्थानम्) वृद्धि (भवति) होती है (तदा) तब-तब
(हि) ही (अहम्) मैं (आत्मानम्) अपना अंश अवतार (सृजामि) रचता हूँ अर्थात्
उत्पन्न करता हूँ। (7)

जैसे श्री मद्भगवत् गीता अध्याय 4 श्लोक 7 में गीता ज्ञान दाता ने कहा है

कि जब-जब धर्म में घृणा उत्पन्न होती है। धर्म की हानि होती है तथा अधर्म की
वृद्धि होती है तो मैं (काल = ब्रह्म = क्षर पुरूष) अपने अंश अवतार सृजन करता
हूँ अर्थात् उत्पन्न करता हूँ।
जैसे श्री रामचन्द्र जी तथा श्री कृष्ण चन्द्र जी को काल ब्रह्म ने ही पृथ्वी पर
उत्पन्न किया था। जो स्वयं श्री विष्णु जी ही माने जाते हैं।
इनके अतिरिक्त 8 अवतार और कहे गये हैं। जो श्री विष्णु जी स्वयं नहीं आते
अपितु अपने लोक से अपने कृपा पात्रा पवित्रा आत्मा को भेजते हैं। वे भी अवतार
कहलाते हैं। कहीं-2 पर 25 अवतारों का भी उल्लेख पुराणों में आता है। काल ब्रह्म
(क्षर पुरूष) के भेजे हुए अवतार पृथ्वी पर बढ़े अधर्म का नाश कत्लेआम अर्थात्
संहार करके करते हैं।
उदाहरण के रूप में :- श्री रामचंद्र जी तथा श्री कृष्णचंद्र जी, श्री परशुराम
जी तथा श्री निःकलंक जी (जो अभी आना शेष है, जो कलयुग के अन्त में
आएगा)। ये सर्व अवतार घोर संहार करके ही अधर्म का नाश करते हैं। अधर्मियों
को मारकर शांति स्थापित करने की चेष्टा करते हैं। परन्तु शांन्ति की अपेक्षा
अशांति ही बढ़ती है। जैसे श्री रामचंद्र जी ने रावण को मारने के लिए युद्ध किया।
युद्ध में करोड़ों पुरूष मारे गए। जिन में धर्मी तथा अधर्मी दोनों ही मारे गए। फिर
उनकी पत्नियाँ तथा छोटे-बड़े बच्चे शेष रहे उनका जीवन नरक बन गया।
विधवाओं को अन्य व्यक्तियों ने अपनी हवस का शिकार बनाया। निर्वाह की समस्या
उत्पन्न हुई आदि-2 अनेकों अशांति के कारण खड़े हो गए। यही विधि श्री कृष्ण
जी ने अपनाई थी, यही विधि श्री परशुराम जी ने अपनाई थी। इसी विधि से दशवां
अवतार काल ब्रह्म (क्षर पुरूष) द्वारा उत्पन्न किया जाएगा। उसका नाम ‘‘निःकलंक’’
होगा। वह कलयुग के अन्तिम समय में उत्पन्न होगा। जो राजा हरिशचन्द्र वाली
आत्मा होगी। संभल नगर में श्री विष्णु दत्त शर्मा के घर में जन्म लेगा। उस समय
सर्व मानव अत्याचारी - अन्यायी हो जाऐंगे। उन सर्व को मारेगा। उस समय जिन-2
मनुष्यों में परमात्मा का डर होगा। कुछ सदाचारी होंगे उनको छोड़ जाएगा अन्य
सर्व को मार डालेगा। यह विधि है ब्रह्म (काल-क्षर पुरूष) के अवतारों की अधर्म का

नाश करने तथा शांति स्थापना करने की।


और अधिक जानकारी के लिए रोजाना सुने सत्संग साधना टीवी शाम 7:30 बजे।
ज्ञान गंग जीने की राह पुस्तक जरूर पढ़ें।

सोमवार, 1 जून 2020

कबीरपरमेश्वर_के_चमत्कार

कबीरपरमेश्वर_के_चमत्कार

4दिन_बाद_कबीरप्रकटदिवस




शिशु कबीर परमेश्वर का नामांकन"
जब कबीर साहेब का नाम रखने के लिए कुरान शरीफ पुस्तक को काज़ी ने खोला। प्रथम नाम ‘‘कबीरन्’’ लिखा था। काजियों ने सोचा इस छोटे जाति वाले का कबीर नाम रखना शोभा नहीं देगा। पुनः कुरान शरीफ खोली तो उसमें सर्व अक्षर कबीर-कबीर-कबीर-कबीर हो गए। कबीर परमेश्वर शिशु रूप में बोले मैं कबीर अल्लाह अर्थात् अल्लाहु अकबर, हूँ। मेरा नाम ‘‘कबीर’’ ही रखो।
सकल कुरान कबीर है, हरफ लिखे जो लेख।
काशी के काजी कहै, गई दीन की टेक।।





कबीर जी द्वारा स्वामी रामानन्द के मन की बात बताना’’
स्वामी रामानंद जी विष्णु जी की काल्पनिक मूर्ति बनाकर मानसिक पूजा करते थे। एक समय ठाकुर की मूर्ति पर माला डालनी भूल गए। तब कबीर परमात्मा जो कि 5 वर्ष के बालक की लीला कर रहे थे बोले कि माला की गांठ खोल कर गले में डाल दो स्वामी जी, पूजा खंडित नहीं होगी। तब रामानंद जी जो पर्दे के भीतर मन में पूजा कर रहे थे, कबीर परमात्मा को सबके सामने गले लगा लिया।
मन की पूजा तुम लखी मुकुट माल परवेश।
गरीबदास गति कौ लखै, कौन वरण क्या भेष।।




जगन्नाथ के पांडे की कबीर जी द्वारा रक्षा"
जगन्नाथ पुरी में एक रामसहाय पाण्डा खिचड़ी का प्रसाद उतार रहा था। गर्म खिचड़ी उसके पैर पर गिर गई। उस समय कबीर जी अपने करमण्डल से हिम जल रामसहाय पाण्डा के पैर पर डाला। उसके तुरंत बाद राहत मिलते ही पैर ठीक हो गया। उस समय कबीर जी ना होते रामसहाय पाण्डा का पैर जल जाता।
गरीबदास जी देते हैं -
पग ऊपरि जल डालकर, हो गये खड़े कबीर। गरीबदास पंडा जरया, तहां परया योह नीर।।
जगन्नाथ जगदीश का, जरत बुझाया पंड। गरीबदास हर हर करत, मिट्या कलप सब दंड।।




मृत लड़की को जीवित करना"
शेखतकी ने कबीर साहेब को कहा कि अगर आप अल्लाह हो तो मेरी इस मृत लड़की को जीवित कर दो तब कबीर साहेब ने शेखतकी की मृत लड़की को जीवित कर किया था और उस लड़की का नाम कमाली रख दिया था।




महर्षि सर्वानन्द की माँ शारदा का रोग ठीक करना"
एक सर्वानन्द नाम के महर्षि थे। उसकी आदरणीय माता श्रीमती शारदा देवी पाप कर्म फल से पीडि़त थी। उसने कबीर परमात्मा से उपदेश प्राप्त किया तथा उसी दिन कष्ट मुक्त हो गई।
क्योंकि पवित्र यजुर्वेद अध्याय 5 मंत्र 32
में लिखा है कि ‘‘कविरंघारिरसि‘‘ अर्थात् (कविर्) कबीर (अंघारि) पाप का शत्रु (असि) है। फिर इसी पवित्र यजुर्वेद अध्याय 8 मंत्र 13 में लिखा है कि परमात्मा (एनसः एनसः) अधर्म के अधर्म अर्थात् पापों के भी पाप घोर पाप को भी समाप्त कर देता है।




गोरखनाथ के साथ चमत्कार
एक बार गोरखनाथ जी जब कबीर परमेश्वर जी के साथ ज्ञान गोष्ठी कर रहे थे तो गोरखनाथ जी कबीर जी के सामने 5-6 फुट का त्रिशूल जमीन में गाड़कर उस पर बैठ गये और कहा कि यदि वार्ता करनी है तो मेरे साथ आकर बैठो।
कबीर जी ने एक धागे की रील आसमान में उछाली और 150 फुट की ऊंचाई पर धागे के अंतिम सिरे पर जाकर बैठ गए।
गोरखनाथ जी देखते रह गए।



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रविवार, 31 मई 2020

कबीर साहिब जी प्रकट हुए थे_ kabir prkt divs

क्या आप जानते हैं की कबीर साहिब जी प्रकट हुए थे।

सन् 1398 में कबीर साहिब जी काशी के लहरतारा तलाब मैं एक कमल के फूल पर नीरू नीमा को मिले थे।
नीरू ने कबीर साहिब जी को घर ले जाने से मना कर दिया था। परंतु पूर्ण परमात्मा ने उन्हें कहा कि मुझे घर पर ले चलो आपको लोग कुछ भी नहीं कहेंगे।
तब नीरू ने परमात्मा कबीर साहेब जी को अपने कुटिया में लगे थे।






कबीर साहिब जी ने 25 दिन तक दूध नहीं पिया था।
नीमा शिव जी का ध्यान देती थी वह शिव जी को पुकार करती है तो शिवजी एक ऋषि के रूप में नीरू के घर आए। उस ऋषि ने कबीर साहिब जी को अपनी गोद में लिया और उनसे 7 बार वार्ता की। तब कबीर जी ने उस ऋषि को कहा था कि इन्हें कहिए कि वह एक कुंवारी गाय लेकर आए उसका दूध पियूंगा।






तब कुंवारी गाय लाने के बाद कबीर जी के कहने के उपरांत ऋषि जी ने गाय के पीठ पर हाथ रखा और दूध निकलने लगा।
तब परमात्मा जी ने उस कुमारी गाय का दूध पिया था।
उस पूर्ण परमात्मा के बारे में वेद भी प्रमाणित करते हैं कि वह पूर्ण परमात्मा शिशु रूप धारण कर कर कुंवारी गाय का दूध पीता है।


आइए देखते हैं वेदों में

ऋग्वेद मण्डल 9 सूक्त 1 मंत्रा 9
अभी इमं अध्न्या उत श्रीणन्ति धेनवः शिशुम्। सोममिन्द्राय पातवे।।9।।
अभी इमम्-अध्न्या उत श्रीणन्ति धेनवः शिशुम् सोमम् इन्द्राय पातवे।
(उत) विशेष कर (इमम्) इस (शिशुम्) बालक रूप में प्रकट (सोमम्) पूर्ण परमात्मा अमर
प्रभु की (इन्द्राय) सुखदायक सुविधा के लिए जो आवश्यक पदार्थ शरीर की (पातवे) वृद्धि के लिए
चाहिए वह पूर्ति (अभी) पूर्ण तरह (अध्न्या धेनवः) जो गाय, सांड द्वारा कभी भी परेशान न की गई
हां अर्थात् कुँवारी गायों द्वारा (श्रीणन्ति) परवरिश की जाती है।

भावार्थ- पूर्ण परमात्मा अमर पुरुष जब लीला करता हुआ बालक रूप धारण करके
स्वयं प्रकट होता है सुख-सुविधा के लिए जो आवश्यक पदार्थ शरीर वृद्धि के लिए चाहिए वह
पूर्ति कुँवारी गायों द्वारा की जाती है अर्थात् उस समय (अध्नि धेनु) कुँवारी गाय अपने आप
दूध देती है जिससे उस पूर्ण प्रभु की परवरिश होती है।






इससे सिद्ध होता है कि पूर्ण परमात्मा कबीर साहेब जी हैं जो शिशु रूप धारण कर कुंवारी गाय का दूध पीते हैं।
आपको सभी देवी देवताओं की जीवनी पता है उन्होंने कभी भी किसी कुंवारी गाय का दूध नहीं पिया है।
अब प्रमाण आपके सामने हैं अब आपको निर्णय करना है कौन पूर्ण परमात्मा है।

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