बुधवार, 15 जुलाई 2020

नाग पंचमी कब है 2020

नाग पंचमी कब है?


2020: नाग पंचमी का पर्व 25 जुलाई को शनिवार के दिन मनाया जाएगा। हर साल नाग पंचमी का त्योहार सावन माह के शुक्ल की पंचमी तिथि को मनाया जाता है।


नाग पंचमी पर इस तरह करें।

ऐसे करें पूजा


-सबसे पहले प्रात: उठकर घर की साफ-सफाई करें और स्‍नान करें।

-इसके बाद प्रसाद स्‍वरूप सिंवई की खीर और चावल बना लें।

-लकड़ी के पटरे पर साफ लाल या पीला कपड़ा बिछाकर उस पर नागदेवता की प्रतिमा या फिर तस्‍वीर रख दें।

-प्रतिमा पर जल, फूल, फल और चंदन लगाएं।

-नाग की प्रतिमा को दूध, दही, घी, मधु और पंचामृत से स्‍नान कराएं और फिर आरती करें।

-पूजा के बाद आप घर के मुख्‍य द्वार के दोनों ओर गोबर से सांप की आकृति के चिह्न बनाएं और उस पर कौड़ियां चिपकाएं और खीर अर्पित करें। ऐसा करने से आपके घर की बुरी शक्तियों से रक्षा होती है और मां लक्ष्‍मी का आगमन होता है।


नाग पंचमी से 5 लाभ होते हैं।



हिंदू धर्म में सांप को दैवीय जीव के रूप में पूजा जाता है। प्राचीनकाल से ही नागपंचमी के दिन सांपों की पूजा की जाती रही है। नागपंचमी का पर्व मनाने के पीछे कई रोचक पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। जानते हैं इस त्‍योहार के बारे में अन्‍य खास बातें…


1.हिंदुओं के अराध्‍य देवताओं का सांपों के प्रति विशेष लगाव प्राचीन काल से ही है। शेषनाग पर लेटे भगवान विष्‍णु हों या फिर कंठ में सर्परूपी माला धारण करने वाले भगवान शिव। यहां तक कि माता पार्वती के कई मंदिरों में भी नागों की विशेष पूजा होती है। लोग मां दुर्गा के प्रारंभिक स्‍वरूप के रूप में भी नागों की पूजा करते हैं।

2. सावन मास के शुक्‍ल पक्ष की पंचमी तिथि को नागपंचमी मनाई जाती है। इस बार यह 15 अगस्‍त को है। वहीं देश के कई भागों में सावन के कृष्‍ण पक्ष की पंचमी को भी नागपंचमी के रूप में मनाया जाता है।

3.हिंदू पुराणों में नागों को पाताल लोक या फिर नाग लोक का स्‍वामी माना जाता है। नागपंचमी के दिन सर्पों की देवी मनसा देवी की विशेष पूजा की जाती है। दक्षिण भारत में हिमालय श्रृंखला के शिवालिक पर्वत पर मनसा देवी का विशाल मंदिर स्थित है। मान्‍यता है कि भगवान शिव के अंश से ही मनसा देवी की उत्‍पत्ति हुई थी। इन्‍हें नाग समुदाय की देवी और नागराज वासुकी की बहन भी माना जाता है। मान्‍यता है कि नागपंचमी के दिन मनसा देवी की आराधना करने से भक्‍तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और नाग दंश का भय दूर होता है।

4. नागपंचमी के दिन सांपों को दूध और लावा अर्पित करके भक्‍तजन अपने परिवार के सुख, समृद्धि और सुरक्षा का वरदान मांगते हैं। भारत के अलावा यह त्‍योहार पड़ोसी देश नेपाल में भी धूमधाम से मनाया जाता है। कुछ स्‍थानों पर चतुर्थी के दिन भी सांपों की पूजा होती है। इसे नाग चतुर्थी कहा जाता है।


5. पुराणों में बताया गया है कि एक बार कालिया नाग ने पूरी यमुना नदी के पानी में अपने शरीर से विष घोल दिया था। बृजवासियों के लिए नदी का पानी जहर बन चुका था। फिर भगवान विष्‍णु के अवतार भगवान कृष्‍ण ने बृजवासियों की समस्‍या के निवारण के लिए एक चाल चली। ए‍क दिन वह गेंद ढूंढने के बहाने से यमुना में कूद गए और वहां डेरा डाले कालिया नाग को युद्ध में पछाड़ दिया।

युद्ध में पराजित होने के बाद कालिया नाग ने नदी में घुले अपने संपूर्ण विष को वापस ले लिया। उस दिन सावन की पंचमी तिथि थी। इसके बदले में भगवान कृष्‍ण ने उन्‍हें वरदान दिया कि जो भी पंचमी के दिन सर्प देवता को दूध पिलाएगा उसके जीवन से सारे कष्‍ट दूर हो जाएंगे। उसी दिन से नागपंचमी का त्‍योहार मनाया जाता है।

6. नागपंचमी मनाने के पीछे समुद्र मंथन से जुड़ी एक और कथा प्रचलित है। मान्‍यता है कि समुद्र मंथन से निकले हलाहल विष की कुछ बूंदों को सांपों ने पी लिया। इसके बाद से सांप जहरीले हो गए। इसलिए अपने परिवार को नागदंश से बचाने के लिए नागपंचमी के दिन भक्‍त सर्प देवता की पूजा करते हैं। भविष्य पुराण में और महाभारत में नागपंचमी की पूजा का संबंध पाण्डव वंशीय राजा जनमेजय के नाग यज्ञ से बताया गया है।

लाभ 


इस दिन व्रत पूजन से नाग देवता का आशीर्वाद प्राप्त होता है। नागदेवता का आशीष वंश वृद्धि के साथ, सुख, सौभाग्य,समृद्धि,सफलता,संपन्नता और स्नेहमयी जीवन के लिए शुभ और फलदायक होता है।

इस दिन पूजन से पितरों को तृप्ति और शांति मिलती है। पितृ प्रसन्न होकर आशीर्वाद प्रदान करते हैं।

संत रामपाल जी महाराज
नाग देवता की पूजा करने से परमात्मा प्राप्ति नहीं होती है । न ही मोक्ष की प्राप्ति होती है।
यह साधना शास्त्रों के विरुद्ध है।
आज पूरे विश्व में सही शस्त्र अनुकूल भगतिविधी जगतगुरु रामपाल जी महाराज के पास है। जो हमारे शास्त्र में प्रमाणित हैं। अर्थात् वेद ,गीता इत्यादि।
नाग पंचमी पर स्पेस्ल वीडियो
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https://youtu.be/BtejbftdKo8

अधिक जानकारी के लिए देखें साधना टीवी 7:30शाम ।
और पडे पुस्तक ज्ञान गंगा , जीने की राह

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बुधवार, 8 जुलाई 2020

सही शिक्षा क्या है?

शिक्षा का अर्थ



Shiksha ka mahatva
सही शिक्षा का महत्व

लैटिन भाषा के ‘एडूकेटम’ शब्द का अर्थ है शिक्षित करना। ‘ए’ का अर्थ है अन्दर से तथा ‘डूको’ का अर्थ है आगे बढ़ना अथवा विकास अर्थात अन्दर से विकास। अब प्रश्न यह उठता है कि अन्दर से विकास का अर्थ क्या है ? इस प्रश्न का सरल उत्तर यह है कि प्रत्येक बालक के अन्दर जन्म से ही कुछ जन्मजात प्रवृतियां होती है। जैसे-जैसे बालक वातावरण के संपर्क में आता जाता है, वैसे-वैसे उसकी जन्मजात शक्तियों को अन्दर से बाहर की और विकसित करना, अन्दर को ठूंसना नहीं। एडुकेटम का अतिरिक्त उक्त दोनों शब्दों - एडूसीयर तथा एडूकेयर का अर्थ भी यही है। एडूसीयर का अर्थ है – निकालना तथा एडूकेयर का अर्थ है- आगे बढ़ना, बाहर निकालना अथवा विकसित करना। इस प्रकार शिक्षा शब्द का अर्थ है जन्मजात शक्तियों का सर्वांगीण विकास है।

सच्ची शिक्षा की परिभाषा

https://youtu.be/w1d7quUBIT8
सच्ची शिक्षा की परिभाषा

शिक्षा के विभिन्न अर्थों, अधरों तथा परिभाषा पर प्रकाश डालने से यह स्पष्ट हो जाता है कि शिक्षा एक सापेक्ष, चेतन अथवा अचेतन, मनोवैज्ञानिक, सामाजिक, वैज्ञानिक, एवं दार्शनिक वातावरण सम्बन्धी प्रक्रिया है जिसके द्वारा व्यक्ति के व्यक्तित्व सम्बन्धी सभी अंगों का विकास इस प्रकार से होना चाहिये कि वह परिवर्तन विरोधी तथा रचनात्मक साधनों के द्वारा सच्चा सुख और आनन्द प्राप्त कर सके। संक्षेप में, शिक्षा वातावरण सम्बन्धी सविचार प्रक्रिया है जिसके द्वारा मानव का विकास तथा समाज का कल्याण होना चाहिये। Remont ने भी शिक्षा को विकास की सचेतन तथा आजीवन चलने वाली प्रक्रिया माना है जिसके द्वारा मनुष्य अध्यात्मिक, भौतिक तथा सामाजिक आदि सभी प्रकार के विभिन्न वातावरणों से समायोजन प्राप्त करना सीख जाये। अत: शिक्षा को परिभाषित करते हुए remont ने ठीक ही लिखा है – शिक्षा उस विकास का नाम हिया जो शैशव अवस्था से प्रौढ़ अवस्था तक होता ही रहता है अर्थात शिक्षा वह क्रम है, जिससे  मानव अपने को आवश्यकतानुसार भौतिक, सामाजिक तथा आध्यात्मिक वातावरण के अनुकूल बना लेता है।

शिक्षा क्या है?

https://youtu.be/QGiKiPneyHo
शिक्षा क्या है?

   शिक्षा शब्द संस्कृत के शिक्ष् धातु से बना है जिसका अर्थ है सीखना या सिखाना। यानि इस अर्थ में शिक्षा सीखने-सिखाने की प्रक्रिया है। शिक्षा के लिए विद्या शब्द का भी उपयोग किया जाता है जिसका अर्थ होता है जानना। एजुकेशन शब्द लैटिन भाषा के चार शब्दों से मिलकर बना है जिसका अर्थ है प्रशिक्षित करना, अन्दर से बाहर निकालना, पालन पोषण करना और आंतरिक से वाह्य की तरफ जाना।
अतः संक्षेप में कहा जा सकता है कि शिक्षा का अर्थ मनुष्य की आंतरिक शक्तियों को बाहर की तरफ आने के लिए प्रेरित करना। जॉन एडम्स के मुताबिक प्राचीन काल में शिक्षा शिक्षक केंद्रित थी। जिसके दो छोर थे, शिक्षक और शिक्षार्थी। बाद में जॉन डिवी ने शिक्षा को बालकेंद्रित बताते हुए इसके तीन केंद्रों का जिक्र किया। जो क्रमशः शिक्षक, शिक्षार्थी और पाठ्यक्रम हैं।
शिक्षा की विभिन्न परिभाषाएं
गीता से अनुसार, “सा विद्या विमुक्ते”। यानि विद्या वही है जो बंधनों से मुक्त करे।

इस शिक्षा से क्या लाभ लें


इस शिक्षा का हमें लाभ लेना चाहिए कि हम अपने सद ग्रंथों को समझें। की उम्र में परमात्मा मिलने की विधि बताई गई है। वह विधि अपनाकर हम पूर्ण मोक्ष प्राप्त कर सकते हैं। इस शिक्षा का सही उपयोग तो यह है की हमारा परमात्मा कौन है कहां रहता है वह कैसा है यह जानना हमारे लिए बहुत ही अनिवार्य है। आज इस पूरे विश्व में एक ही ऐसे संत हैं जो सद ग्रंथों से प्रमाणित की विधि बता रहे हैं। संत रामपाल जी महाराज है। जिन्होंने यह सभी ग्रंथों से प्रमाणित किया है कि हमारा परमात्मा पूर्ण ब्रह्म एक है उसका नाम कबीर है।
और अधिक जानकारी के लिए रोजाना देखे सत्संग साधना टीवी पर शाम 7:30 बजे।
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शिक्षा के बारे में आपकी कोई राय हो तो कमेंट बॉक्स में अवश्य बताएं।

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